Monday, March 11, 2013


कभी आग दिल में उतर गई 
कभी दर्द मुझमे समां गए 
कुछ आरज़ू मेरी जल गई 
जो बचा था कुछ, वो अशार थे 

तेरी बज्म में तो न आ सके 
जो तेरे आशिक-ओ - मुरीद थे 
तेरी रह गुजर में ही रह गए 
जो भी चलने को तैयार थे 

तेरे संग बीते थे जो लम्हे 
मुझे धुंधले धुंधले से  याद हैं 
ये धुआं धुआं सा हर शजर 
है ये  जिंदगी या ख्याल है 

साहिल १ /३/२०१३ 

Saturday, February 9, 2013

मालव माटी के चरणों में अर्पित कुछ शब्द पुष्प-

हे मालव माटी तुझे नमन है
 तेरे चरणों में वंदन है 
रज तेरी  माथे पर लगाऊ
जैसे शीतल चन्दन है 
हे  मालव माटी तुझे नमन है
 तेरे चरणों में वंदन है


तेरी गोद में जन्मा हूँ तो 
आनंदित मेरा  हर क्षण है 
तेरे  आशीष से बना हुआ 
मेरे शरीर का हर एक कण है 
हे मालव माटी तुझे नमन है
 तेरे चरणों में वंदन है


मोहन गोडबोले ( साहिल)- 10-2-13

Sunday, January 6, 2013

लौट कर आजा


मेरे अल्फाजों को बंदिश में, सजाने के लिए 
लौट कर आजा एक बार, ज़माने के लिए 

बुझे बुझे से थे मेरे दिल में, जो बरसों बरस 
ऐसे अरमानों को फिर आग लगाने के लिए 
लौट कर आजा एक बार, ज़माने के लिए 

तुझमे मुझमे कभी पा न सके,जो मंजिल अपनी 
ऐसे जज्बात को सही राह, दिखाने  के लिए 
लौट कर आजा एक बार, ज़माने के लिए 

जश्न-ऐ-रुसवाई की महफ़िल के किसी कोने में 
मेरे आगाज़ को अंजाम तक, लाने के लिए 
लौट कर आजा एक बार, ज़माने के लिए 

मेरे अल्फाजों को बंदिश में, सजाने के लिए 
लौट कर आजा एक बार, ज़माने के लिए 

मोहन गोडबोले(साहिल)- 7/1/13  

Sunday, December 16, 2012

बन रहे थे जो सबब मुश्किल का, मेरे अपनों की,
बहा दी अस्थियाँ गंगा में, मैंने ऐसे सपनों की 


- साहिल 

Friday, December 7, 2012

तेरे मद भरे नैनों में , जिंदगी की शाम हो जाये
तू जो एक बार छू ले, हर पैमाना जाम हो जाये 

साथिया आज हम पे ,बस इतनी  इनायत कर दे 
तेरे हाथों से ही जीने मरने  का, इंतजाम हो जाये 

कब तलक दौर ऐ जहाँ में ,रुसवाइयां मिलती रहे 
कभी तो इस बेचैन दिल को , आराम हो जाये 

साहिल - 07/12/12 

Tuesday, November 20, 2012

आरज़ू

मुझसे बेहतर तुझे इश्क की, कोई वजह मिले न मिले 
आरज़ू है  मेरे दिल को , तू आजमा के तो देख 


तेरे दिल की हो या मेरे दिल की, कोई सुबह खिले न खिले 
  चन्द लम्हों की मुलाक़ात को तू आ के तो देख 

पिघल जाने दे आज  जज्बातों को मोंम की तरह 
एक बार मुझे सीने से लगा के तो देख
 
तेरी हिकारत तो सदियों से सहता रहा 
एक बार मेरी तरफ मुस्कुरा के तो देख 

न मिल मुझसे मौसम की तरह रंग बदले बदले 
एक बार असल मिजाज़ में तू आके तो देख 

मुझसे बेहतर तुझे इश्क की, कोई वजह मिले न मिले 
आरज़ू है  मेरे दिल को , तू आजमा के तो देख 


मोहन गोडबोले (साहिल)- 21/11/12 

Tuesday, October 30, 2012


"आलम ऐ वक़त ऐ फुर्सत की जानिब से "

कुछ अजीब संगीन  सी हो चली है ज़िन्दगी
वो ही धड़कने वो ही साँसे, वो ही आरज़ू वो हो ख्वाहिशें 
वो ही जुस्तजू वो ही उलझनें ,वो ही कश्मकश  और वो ही सिलसिले 
दिल ही तो है कोई कांच का खिलौना नहीं,
 टूटे बिखरे तो भी जंचता अब  रोना नहीं 
वो ही मुद्दतों का इंतज़ार, बार बार हर बार लगातार 
वो ही कोशिशें वो ही हसरतें ,वो ही दिल के जख्मो पे पड़े जाले 
वो ही बंदिशें वो ही फुरसतें ,वो ही अँधेरे और वो ही उजाले 
वो ही आईने वो ही सूरतें, वो ही चलती फिरती इंसानी मूरतें 
वो ही सुबहें वो ही शामें , वो ही घनघोर बादल मतवाले 
डोर नाज़ुक महीन सी हो चली है ज़िन्दगी ..

वो ही तमन्नाओं का टुटा हुआ सितारा 
वो ही पागल मन बंजारा आवारा,
वो हर किसी की आँखों में, शिकायतों का मौसम 
वो ही थके से क़दमों के सदाएं देते छाले 
वो बेहिसाब फ़िक़रे वो बे हिसाब ताने 
वो भरे भरे से मैक़द और वो ख़ाली ख़ाली प्याले ,
वो बेक़रार सासें  वो ही इंतज़ार उनका 
वो झूठे मूठे शिकवे और वो झूठे मूठे नाले 
कुछ अजीब रंगीन सी हो चली है ज़िन्दगी 


मोहन गोडबोले (साहिल)
31/10/2012