Tuesday, April 8, 2025

 

Mohan Godbole: A Symphony of Professions and Passions

There are individuals who follow a single path in life. And then, there are those like Mohan Godbole—a person who doesn't just walk one road but dances gracefully between the realms of corporate success, classical music, and soulful poetry.

Born in Indore, Madhya Pradesh, Mohan’s journey is one of discipline, discovery, and devotion. From boardrooms to concert halls, his life strikes a perfect balance between ambition and art.


The Professional Canvas

With over 19 years of experience in the insurance and telecom sectors, Mohan has become a recognized leader in training and development. He currently serves as GM – Lead Training/Home Sales Academy Head at Reliance Jio Fiber, where he leads high-performing teams, crafts impactful learning strategies, and drives growth through structured capability building.

He holds a Master’s in Human Resource Management, a Master’s in English Literature, and a Bachelor of Commerce. He is also a certified Licentiate and Associate from the Insurance Institute of India.

His professional accolades include:

  • Torch Bearer Award – 4 times
  • Best Trainer of the Year
  • Activation Expert Award
  • Top performer recognition at national and circle levels

The Music Within

Mohan’s artistic soul took root at the age of 10 with the tabla, trained by D.N. Mujumdar, disciple of Ustad Jahangir Khan Sahab of the Indore Gharana.

In 1996, the flute entered his life—and since then, he has dedicated himself to its mastery under the guidance of Dr. Vijay Kumar Bhatt of Dehradun. He has completed his Sangeet Prabhakar in Hindustani Classical Music.

His musical journey is deeply enriched by his association with Swarangan Society, founded by Pt. Rajnish Misra Ji, where he has shared platforms with maestros such as:

  • Padma Bhushan Pt. Rajan-Sajan Misra
  • Ustad Amjad Ali Khan
  • Pt. Niladri Kumar
  • Pt. Hariprasad Chaurasia
  • Pt. Birju Maharaj
  • Girija Devi Ji

He frequently performs at corporate events and town halls and teaches the flute on weekends, continuing the guru-shishya tradition with humility and pride.


The Writer’s Voice

Mohan’s blog, Dastan-E-Sahil, is a poetic journal of emotions. Through pieces like “चुप्पी” and “मैंने लिखा था प्रेम”, he explores silence, love, and the spaces in between the spoken and unspoken.

His poems are quiet, powerful reflections that often mirror the same depth and nuance found in his music.


A Life in Balance

Whether it's leading a high-stakes training program or composing a new melody on the bansuri, Mohan lives his life with balance, discipline, and grace.

He is a rare example of someone who has not compromised one dream for another. Instead, he has embraced all facets of his being—creating a life that resonates with melody, meaning, and momentum.

Mohan Godbole is not just a professional. Not just a musician. Not just a poet.
He is a living symphony, constantly evolving, creating, and inspiring.

Monday, August 19, 2024

ये किस तरह के जाने तुम हो गए हो

 मेरे पास आकर, मुझसे दिल लगा कर मे

रे ज़ख्मों को थोड़ा सा अपना बनाकर

अचानक से ऐसे जो गुम हो गए हो,

ये किस तरह के जाने तुम हो गए हो


वो सुबहें, वो शामें, वो रातें, वो बातें

वो कॉफी के फ्लेवर में घुलती मुलाकातें

जिन्हें भूलकर तवह्हुम हो गए हो 

ये किस तरह के जाने तुम हो गए हो


वो दिन थे के सांसों में 

बस एक नाम तुम्हारा था,

हम तिरे इश्क में गाफिल थे

तुमने वक्त गुजारा था,

कहां मौज ए दरिया थे, ख़ुम हो गए हो 

ये किस तरह के जाने तुम हो गए हो


तव्वहुम—

 भ्रम में पड़ना,


खुम— मटका, घड़ा।


#मोहनगोडबोले"साहिल" –१९\८\२०२४

Tuesday, July 30, 2024

 मैंने लिखा था प्रेम 

ठीक वैसा ही जैसा 

देखा तुम्हारी आंखों में 

मेरे लिए...


मैंने चुना था प्रेम 

ठीक वैसा ही जैसा

 छूकर तुम्हें महसूस किया...


मैंने बुना था प्रेम 

ठीक वैसा ही जैसा 

तुम्हारी यादों ने 

मुझसे बुनवाया था...


मैं चाहता भी था कि असल में 

प्रेम वैसा ही हो,

जैसा मैंने लिखा 

जैसा मैंने बुना 

जैसा मैंने महसूस किया है..


मगर जो प्रेम हुआ 

वह तो वैसा नहीं था 

उसमें विरह था 

वेदना थी 

बिछोह था...


हमेशा ऐसा ही तो हुआ है,

की मेरा लिखा,

मेरा बुना

मेरा छुआ हुआ प्रेम..


वास्तविकता की सीमाओं को 

लांघने से पहले ही 

लड़खड़ा कर 

दम तोड़ता आया है,


वो कहते हैं कि प्रेम दिव्य होता है,

होता होगा,

मेरा वाला दिव्यांग 

रह गया शायद 


#मोहनगोडबोले_२७/७/२४

Wednesday, September 13, 2023

"चुप्पी"

दुनिया में सबसे ख़तरनाक कोई चीज़ है, तो वो है एक दुःख में भरी महिला की "चुप्पी "। मानव इतिहास में जो सबसे विध्वंसकारी चीज़ बनी है वो है एटम बम, मगर उससे भी विध्वंसकारी चीज़ है "चुप्पी"। वो "चुप्पी" जो हज़ारों सवालों को बोलता कर देती है। आप समस्त दुनिया के किसी कोने में चले जाएँ, "चुप्पी" आपको अपना प्रभाव दिखा कर रहेगी। समूचीपुरुष प्रजाति या यूँ कहें की 'नर' जाति में उस "चुप्पी" का इलाज ढूंढ पाने की क्षमता और साहस दोनों ही नहीं हैं। 

एक दुःख में भरी महिला अगर "चुप्पी" साध ले तो उसका पार पाना किसी के वश में नहीं होता। उस पर अगर वो आपसे जुड़ी भी रहे और चुप्पी भी  साध ले, तो वो एक अजीब से शून्यता भरे व्यवहार के साथ आपसे मिलेगी। आपको समझ में तो आएगा की कुछ गड़बड़ है, पर आप कभी भी  कुछ कर नहीं पाएंगे। आपकी लाखों कोशिशें केवल व्यर्थ ही जाएंगी। 

इसलिए यकीन मानिये, अगर आपके जीवन में कोई महिला है तो उसे यथासंभव "चुप्पी" ज़ोन में जाने से रोकिये। ऐसी कोई बात, आचरण या व्यवहार मत कीजिये की जो आपकी प्रिय है वो "चुप्पी" साध ले। 

क्यूंकि अगर ऐसा हुआ तो रोज़ फटने वाले एटम बम से ज्यादा भयावह स्थिति आपके जीवन में उत्पन्न हो जाएगी और आपका दिल और दिमाग़ इस दर्द को बर्दाश्त नहीं कर पायेगा। 


#मोहनगोड़बोले"साहिल"

24/8/23

Sunday, June 13, 2021

 


मोहन गोड़बोले "साहिल "


साहिल यानि किनारा 


पता है किनारे की सबसे खास बात क्या होती है, वो नदी का साथ कभी नहीं छोड़ता, 


नदी चाहे शांत समंदर का ठहराव लिए हो, या उफ़न कर सब बहा ले जाने को आतुर हो, साहिल हमेशा उसे संभाले रखता है। 


नदी जब बरसात में अपने पूरे शबाब पर होती है महीने दो महीने, या पूरे साल दूसरे छोर से सटकर बहती हो,  या बीच में एक पतली सी रेखा जैसी बहती हो धीमे धीमे लेकिन निरंतर... 


वो पतली रेखा ही उस साहिल की जीवन रेखा होती है, उसका एक सिरा चाहे अछूता ही क्यूँ न रहे उम्र भर पर उसे सुकून होता है की वो नदी का हिस्सा है। 


कुछ नदियाँ कभी कभार विलुप्त हो जाती हैं, तब किनारा उसकी याद में पत्थर बनकर भी टिका रहता है, वो उस नदी के अस्तित्व को मिटने नहीं देता। 


ऐसी ही किसी 'शीतल' नदी का किनारा हूँ मैं शायद... 

जो नदी का रुख़ मुड़ने के बावजूद , उसके बहने के पुराने रास्ते को सहेजे हुवे दिन-ब-दिन 

बस पत्थर होता जा रहा है, 


नदी के गुज़रने का संगीत अपने दिल में समाये हुवे, समाधी में मग्न है, 


किनारा सदा से नदी का था... 

'साहिल' सदा नदी का ही रहेगा.. 


बरसाती या मौसमी नदी कभी उसे,  अपनी जीवन रेखा से दूर न ले जा सकेगी.. 



पार्श्व में सज्जाद अली गा रहे हैं 


"साहिल" पे खड़े हो तुम्हे क्या ग़म चले जाना 

मैं डूब रहा हूँ अभी डूबा तो नहीं हूँ.... 


Sunday, November 19, 2017

मैंने ज़िदगी की ख़ुशियाँ तुम्हारी आँखों में देख़ने की जुर्रत की

मुझे माफ़ कर सको तो करो


मैंने हर साँस तुम्हारी साँसों के साथ लेने की कोशिश की

मुझे माफ़ कर सको तो करो

मुझे अपने दिल के ज़ख्मों पर तुम्हारी छुअन की ज़रूरत थी

मुझे माफ़ कर सको तो करो

मैं के रिश्ते में बेईमान रह गया
मुझे माफ़ कर सको तो करो

मेरी सारी बद्तमीज़ियों के लिए
मुझे माफ़ कर सको तो करो

मैं अपने वचन पर टिक न पाया
मुझे माफ़ कर सको तो करो

मैं के माफ़ी के क़ाबिल भी नहीं मगर फिर भी
मुझे माफ़ कर सको तो करो

तड़पना, जलना और आहें भरना मेरा मुक़द्दर है,
तुम्हारी बांहों में,
 मैं ये सब भूल गया था,
मुझे माफ़ कर सको तो करो

मुझे माफ़ कर सको तो करो...

Wednesday, September 6, 2017

अब मुझे सीखना पड़ेगा शायद, तेरी यादों से मुख़्तलिफ़ रहना


अब मुझे सीखना पड़ेगा शायद, 
तेरी यादों से मुख़्तलिफ़ रहना, 

क्यूंकि जब भी एहसासों की हदें लाँघकर 
तेरी यादों की जानिब बेसाख़्ता बढ़ता जाता हूँ,
कदम दर कदम गहराती जाती हैं,
हर उस लम्हे की परछाइयां,
जो हमने बिताएं हैं, एक दूसरे के दिल की 
देहलीज़  पर बैठकर,

 यूँ भी कई बार तुमसे
 ख्वाबों में मिलने की कोशिश में,
 यादों के पिटारे को ठोकर मारकर,
 बेवजह गिराया है , दिल की जमीं पर मैंने,
 जाने क्या बात है कि वो जगह अब भी नम है,
 जहाँ गिरी हैं तेरी यादें,

वो सारे मौसम जो हमारे साथ गुजरे हैं 
इन गुज़िश्ता सालों में,
पलट-पलट के लौट आते हैं,
कभी हवा, कभी खुश्बू ,कभी बारिश,
तो कभी तितली बनकर,
फिर उसके बाद आता है, एक तन्हाई का काला बादल
और छा जाता है उस "साहिल" पर,
जहाँ एहसासों की रेत पर,
तेरी यादों के मौसम धूप सेंक रहे होते हैं,

अब मुझे सीखना पड़ेगा शायद, 
तेरी यादों से मुख़्तलिफ़ रहना, 

क्योंकि बेचैन करते हैं मुझे,
ज़ेहन में उठते बेबसी के बवंडर,
जिनमे उड़ जाते हैं मेरे ख्वाबों के हसीं पन्ने,
मेरी चाहत की सारी किताबें,

अब मुझे सीखना पड़ेगा शायद, 
तेरी यादों से मुख़्तलिफ़ रहना, 

कि अब मैं कैसे समझाऊं जग को
भरम अपने रिश्ते का, 
जो रेशम की डोर में लगी गाँठ के जैसा है,

अब मुझे सीखना पड़ेगा शायद, 
तेरी यादों से मुख़्तलिफ़ रहना, 

 कि अब दुश्वार सा लगता है, 
तुझसे फासले रखकर, तुझे अपनाना 
तेरा न होकर भी तेरा ही कहलाना 

अब मुझे सीखना पड़ेगा शायद ..............

साहिल- २०-८-१७