मैंने लिखा था प्रेम
ठीक वैसा ही जैसा
देखा तुम्हारी आंखों में
मेरे लिए...
मैंने चुना था प्रेम
ठीक वैसा ही जैसा
छूकर तुम्हें महसूस किया...
मैंने बुना था प्रेम
ठीक वैसा ही जैसा
तुम्हारी यादों ने
मुझसे बुनवाया था...
मैं चाहता भी था कि असल में
प्रेम वैसा ही हो,
जैसा मैंने लिखा
जैसा मैंने बुना
जैसा मैंने महसूस किया है..
मगर जो प्रेम हुआ
वह तो वैसा नहीं था
उसमें विरह था
वेदना थी
बिछोह था...
हमेशा ऐसा ही तो हुआ है,
की मेरा लिखा,
मेरा बुना
मेरा छुआ हुआ प्रेम..
वास्तविकता की सीमाओं को
लांघने से पहले ही
लड़खड़ा कर
दम तोड़ता आया है,
वो कहते हैं कि प्रेम दिव्य होता है,
होता होगा,
मेरा वाला दिव्यांग
रह गया शायद
#मोहनगोडबोले_२७/७/२४