Monday, August 19, 2024

ये किस तरह के जाने तुम हो गए हो

 मेरे पास आकर, मुझसे दिल लगा कर मे

रे ज़ख्मों को थोड़ा सा अपना बनाकर

अचानक से ऐसे जो गुम हो गए हो,

ये किस तरह के जाने तुम हो गए हो


वो सुबहें, वो शामें, वो रातें, वो बातें

वो कॉफी के फ्लेवर में घुलती मुलाकातें

जिन्हें भूलकर तवह्हुम हो गए हो 

ये किस तरह के जाने तुम हो गए हो


वो दिन थे के सांसों में 

बस एक नाम तुम्हारा था,

हम तिरे इश्क में गाफिल थे

तुमने वक्त गुजारा था,

कहां मौज ए दरिया थे, ख़ुम हो गए हो 

ये किस तरह के जाने तुम हो गए हो


तव्वहुम—

 भ्रम में पड़ना,


खुम— मटका, घड़ा।


#मोहनगोडबोले"साहिल" –१९\८\२०२४

Tuesday, July 30, 2024

 मैंने लिखा था प्रेम 

ठीक वैसा ही जैसा 

देखा तुम्हारी आंखों में 

मेरे लिए...


मैंने चुना था प्रेम 

ठीक वैसा ही जैसा

 छूकर तुम्हें महसूस किया...


मैंने बुना था प्रेम 

ठीक वैसा ही जैसा 

तुम्हारी यादों ने 

मुझसे बुनवाया था...


मैं चाहता भी था कि असल में 

प्रेम वैसा ही हो,

जैसा मैंने लिखा 

जैसा मैंने बुना 

जैसा मैंने महसूस किया है..


मगर जो प्रेम हुआ 

वह तो वैसा नहीं था 

उसमें विरह था 

वेदना थी 

बिछोह था...


हमेशा ऐसा ही तो हुआ है,

की मेरा लिखा,

मेरा बुना

मेरा छुआ हुआ प्रेम..


वास्तविकता की सीमाओं को 

लांघने से पहले ही 

लड़खड़ा कर 

दम तोड़ता आया है,


वो कहते हैं कि प्रेम दिव्य होता है,

होता होगा,

मेरा वाला दिव्यांग 

रह गया शायद 


#मोहनगोडबोले_२७/७/२४